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देश के 13 राज्यों और 80 से ज़्यादा ज़िलों से होते हुए 8500 किलोमीटर तय करेगी यात्रा!!

The Star India ,New delhi:6 दिसम्बर, 2023 , नयी दिल्ली में बढ़ती महँगाई, बेरोज़गारी, भ्रष्टाचार और साम्प्रदायिक नफ़रत के विरुद्ध देशव्यापी माहौल तैयार करने के मकसद से भगतसिंह जन अधिकार यात्रा का दूसरा चरण 10 दिसम्बर को बेंगलुरु से शुरू हो रहा है जो 13 राज्यों से गुज़रते हुए 3 मार्च को दिल्ली में रैली के साथ समाप्त होगा। इस दौरान यात्रा 8500 किलोमीटर का सफ़र तय करते हुए 80 से अधिक ज़िलों से गुज़रेगी।
“भगतसिंह जनअधिकार यात्रा” के संयोजक संगठनों ने आज दिल्ली के प्रेस क्लब ऑफ़ इण्डिया, में आयोजित प्रेस वार्ता के ज़रिये इस यात्रा के मक़सद और आने वाले लोकसभा चुनावों के मद्देनज़र इसकी अहमियत पर बात रखी।
भगतसिंह जनअधिकार यात्रा की प्रवक्ता और दिल्ली स्टेट आँगनवाड़ी वर्कर्स एण्ड हेल्पर्स यूनियन की अध्यक्ष शिवानी ने कहा कि इस यात्रा के तहत हम देश के 13 राज्यों में मेहनतकश अवाम के बीच उन मुद्दों को लेकर जा रहे हैं जो किसी भी चुनावबाज़ पार्टी के लिए मुद्दा नहीं हैं। आने वाले लोकसभा चुनाव के मद्देनज़र यह ज़रूरी है कि जनता शिक्षा, चिकित्सा, रोज़गार और आवास के बुनियादी मसलों पर इन तमाम पार्टियों को घेरे। ख़ास तौर पर मौजूदा भाजपा सरकार के जुमलों पर आज उसे घेरने की ज़रूरत है।
ज्ञात है कि “भगतसिंह जनअधिकार यात्रा” भारत की क्रान्तिकारी मज़दूर पार्टी (RWPI), दिल्ली स्टेट आँगनवाड़ी वर्कर्स एण्ड हेल्पर्स यूनियन (DSAWHU), नौजवान भारत सभा, दिशा छात्र संगठन और बिगुल मज़दूर दस्ता व अन्य संगठनों की संयुक्त अगुवाई में चलाई जा रही है। इसके पहले चरण की शुरुआत इस वर्ष 10 मार्च को हुई थी जिसके बाद 10 मई, 2023 को दिल्ली में राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया गया था। दूसरे चरण में यात्रा कर्नाटक के बंगलुरु से 10 दिसम्बर 2023 को शुरू होगी और तक़रीबन 90 दिनों में यह यात्रा देश के 13 राज्यों से गुज़रेगी; 8500 किलोमीटर लम्बा सफ़र तय करके 26 फरवरी, 2024 को दिल्ली पहुंचेगी। 26 फरवरी से 2 मार्च तक दिल्ली के अलग-अलग इलाकों से यात्रा गुज़रेगी और फिर 3 मार्च को दिल्ली में ही इस यात्रा का समापन किया जाएगा।
शिवानी ने कहा कि “अच्छे दिन” का वायदा करने वाली भाजपा ने पिछले 10 सालों में आम जनता की ज़िन्दगी बद से बदतर कर दी है। जनता के ऊपर टैक्सों का पहाड़ लाद देने से महँगाई बढ़ती जा रही है। भारतीय अर्थव्यवस्था निगरानी केन्द्र (सीएमआईई) की ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार बेरोज़गारी 10.1 % के साथ एक नये चरम पर है। मज़दूरों के श्रम की लूट को आसान बनाने के लिए और पूँजीपतियों को रियायतें देने में इस सरकार ने कोई कसर नहीं छोड़ रखी है। देशभर में तक़रीबन 1 करोड़ स्कीम वर्कर्स के हालात बेहद बुरे हैं। जिन कोविड वारियर्स को केन्द्र सरकार सम्मानित कर रही थी, उन्हें न्यूनतम मज़दूरी भी नहीं दी जाती। इन ज़रूरी मसलों से जनता का ध्यान भटकाने के लिए भाजपा और संघ परिवार साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के ज़रिये जनता को आपस में बाँटने की कोशिश में लगे हैं जो लोकसभा चुनाव करीब आने के साथ तेज़ होती जाएगी। हमारी यात्रा का मक़सद है कि जनता के असल मसलों को उठाते हुए भगतसिंह की उस बात को याद किया जाये जब उन्होने कहा था कि “अगर कोई सरकार जनता को उसके बुनियादी अधिकारों से वंचित रखती है तो जनता का यह अधिकार ही नहीं बल्कि आवश्‍यक कर्तव्‍य बन जाता है कि ऐसी सरकार को बदल दे या समाप्‍त कर दे।”
भारत की क्रान्तिकारी मज़दूर पार्टी (RWPI) की ओर से योगेश ने कहा कि भगतसिंह, अशफाक़, बिस्मिल, ‘आज़ाद’ जैसे नौजवानों ने आज़ादी के बाद एक समतामूलक समाज की स्थापना का ख़्वाब देखा था, लेकिन आज हालात बिलकुल विपरीत हैं। देश की कुल सम्पत्ति के 40% हिस्से से भी ज़्यादा पर 1% धन्नासेठों का कब्ज़ा है जबकि नीचे की 50% आबादी के पास मात्र 3% सम्पत्ति है। मोदी की छवि बनाने के नाम पर जी20 के भव्य आयोजन पर अरबों रुपये बरबाद किये गये जबकि विश्व भूख सूचकांक में इस साल भारत और नीचे खिसक कर 111वें पायदान पर आ गया है। ऐसे मसलों को जनता की नज़रों से ओझल करने के लिए साम्प्रदायिक कट्टरता को बढ़ावा दिया जा रहा है। पिछले 75 सालों में तमाम पार्टियों ने जनता की लूट को बढ़ाया है, लेकिन मौजूदा मोदी सरकार ने इस लूट को बुलेट ट्रेन की गति से आगे बढ़ा दिया है।
दिशा छात्र संगठन के केशव ने कहा कि भाजपा के राज में शिक्षा के अधिकार पर हमले भी तेज़ हो गये हैं। नयी शिक्षा नीति के ज़रिये मोदी सरकार शिक्षा को पूरी तरह बाज़ार के हवाले करने पर आमादा है। नयी शिक्षा नीति शिक्षा के क्षेत्र से सरकार की ज़िम्मेदारी और जवाबदेही को ख़त्म कर देगी, शिक्षा को देशी-विदेशी पूँजी के लूट के अड्डे में तब्दील कर देगी और शिक्षा के साम्‍प्रदायीकरण का रास्ता साफ़ कर देगी। 1990-91 में शिक्षा पर ख़र्च जीडीपी का 1.4 फ़ीसदी था जिसे 2023-24 में मोदी सरकार ने घटाकर 0.37 फ़ीसदी कर दिया है। इससे स्‍कूलों, कॉलेजों व विश्‍वविद्यालयों का निजीकरण तेज़ होगा और सरकारी शिक्षण संस्‍थानों में फ़ीसें इतनी बढ़ जाएँगी कि आम आदमी के बेटे-बेटियाँ पढ़ने का सपना भी न देख पाएँ। देश के प्राथमिक विद्यालयों में 9,07,585 शिक्षकों की कमी और उच्च प्राथमिक विद्यालयों में एक लाख से अधिक स्वीकृत शिक्षकों के पद ख़ाली हैं। केन्द्रीय और राज्य विश्वविद्यालयों में क़रीबन 70 हजार प्रोफ़ेसरों के पद ख़ाली हैं। शिक्षा पर हमले का जवाब आज छात्रों-नौजवानों को सड़कों पर उतार कर देना होगा और साथ ही शिक्षा के बुनियादी अधिकार की लड़ाई को मेहनतकश जनता के संघर्ष के साथ जोड़ने की ज़रूरत है।
नौजवान भारत सभा के विशाल ने कहा कि आज युवाओं के बीच निराशा और पस्तहिम्मती का माहौल है जिसे तोड़ने के लिए युवाओं को भगतसिंह और उनके साथियों की इंक़लाबी विरासत से परिचित कराने की ज़रूरत है। इस यात्रा के दौरान हम लाखों पर्चों-पोस्टरों, पुस्तिकाओं और कला प्रदर्शनियों के माध्यम से शहीदों के अधूरे सपनों को जनता के बीच ले जाएँगे और उन्हें साकार करने के लिए “क्रान्ति की स्पिरिट ताज़ा करने” का भगतसिंह का अह्वान दोहराएँगे।
पत्रकारों के सवालों के जवाब में शिवानी ने कहा कि अपने बुनियादी अधिकारों पर जनता को एकजुट और लामबन्द किए बग़ैर मौजूदा हालात नहीं बदलने वाले हैं। आने वाले लोकसभा चुनावों में सत्तासीन भाजपा समेत सभी पार्टियाँ जनता के बीच ग़ैर-ज़रूरी मुद्दों का जाल बुनेंगी। इसलिए यह और भी मौजूं वक़्त है कि हम अपनी माँगों को स्पष्ट रूप में सामने लाएँ। दिल्ली की आँगनवाड़ीकर्मियों ने यह फ़ैसला लिया है कि आँगनवाड़ीकर्मियों के लिए यदि तत्काल मानदेय बढ़ोत्तरी की घोषणा कर उसे लागू नहीं किया जाता तो वे आन्दोलन का रास्ता अख़्तियार करेंगी। यही नहीं, वे इस संघर्ष को और विस्तारित करते हुए देशभर की आँगनवाड़ीकर्मियों के साथ संयुक्त संघर्ष का आगाज़ करेंगी।

“भगतसिंह जनअधिकार यात्रा” कि ओर से उठायी जा रही कुछ प्रमुख माँगों में से हैं –
शिक्षा-रोज़गार-स्वास्थ्य-आवास मौलिक अधिकार घोषित हों। निजीकरण पर रोक लगे। भगतसिंह राष्ट्रीय रोज़गार गारण्टी क़ानून पारित करो, रोज़गार न दे पाने की सूरत में 10,000 रुपये प्रतिमाह बेरोज़गारी भत्ता दिया जाये। केन्द्र व राज्य सरकारों के सभी ख़ाली पद शीघ्र भरो। ‘अग्निवीर’ योजना को तत्काल रद्द कर सेना में पक्की भरती की व्यवस्था बहाल की जाये।
सभी श्रम क़ानूनों को सख़्ती से लागू करो, प्रस्तावित चार ‘लेबर कोड्स’ रद्द करो। ग्रामीण मज़दूरों को भी श्रम क़ानूनों के अन्तर्गत लाया जाये। ‘पुरानी पेंशन स्कीम’ बहाल करो। ठेकेदारी प्रथा ख़त्म कर नियमित प्रकृति के कामों पर पक्के रोज़गार का प्रबन्ध करो।
महँगाई पर रोक लगाने के लिए सभी अप्रत्यक्ष करों को समाप्त किया जाये और बढ़ती सम्पत्ति के आधार पर प्रगतिशील प्रत्यक्ष करों की व्यवस्था को मज़बूती के साथ लागू किया जाये।
“सर्वधर्म समभाव” की नकली धर्मनिरपेक्षता की जगह सच्चे धर्मनिरपेक्ष राज्य को सुनिश्चित करने के लिए क़ानून लाया जाये। किसी भी नेता या पार्टी द्वारा धर्म, समुदाय या आस्था का सार्वजनिक जीवन में किसी भी रूप में उल्लेख व इस्तेमाल करना दण्डनीय अपराध घोषित किया जाये।
चुनावी दलों व सरकार द्वारा किये जाने वाले भ्रष्टाचार पर रोक लगे और इनके पब्लिक ऑडिट व जाँच की व्यवस्था की जाये।

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